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Wednesday, 3 May 2017

अब स्मार्टफोन से होगा डॉयबिटीज़ का इलाज !

विज्ञानिको ने चुहो में जीवित कोशिकाओं की गतिविधिओ को नियंत्रित करने के लिए स्मर्टफ़ोने का इस्तेमाल किया है। 

                                                                     
चूहा की जजिसपे प्रयोग किया जा रहा है। और यह प्रयोग चूहे  के ब्लड शूगर के स्त्तर  को नियंत्रित करने के लिए किया गया था जो , की डायबिटीज़ यानि मधुप्रमेह से पीड़ित था । 

                                                                   

                                                                          जिव विज्ञानं और प्रद्योगिकी का इस्तेमाल  चूहों के ब्लड शूगर के स्त्तर  को नियंत्रित करने के लिए किया गया था जो , की डायबिटीज़ यानि मधुप्रमेह से पीड़ित थे। 

                                                                        साइंस ट्रांसलेशन मेडिसिन में प्रकाशित इस शोध में कहा गया हे की इससे डायबिटीज़ के उपचार में मदद मिल सकती है। 
                       

                                                                                विज्ञानिको ने सबसे पहले आम कोशिकाओं में अनुवांशिक रूप से परिवर्तन किये ताकि ऐसी दवा बनाई जा सके जो इंसुलिन की तरह ब्लड शुगर के स्त्तर  को नियंत्रित करती है। एक खास तरह की  रोशनी (स्मार्टफोन  की टच स्क्रीन से निकलने वाली रौशनी से )  ऐसा  संभवित हो पता है। 

    स्मार्टफोन की मदद से चूहे का ब्लड शुगर लेवल चेक किया जा रहा है। 



                                                इस तंत्र को ऑप्टोजिनेटिक्स कहा जाता है , और ये कोशिकाए तब हरकत में आती है , जब विशिष्ठ तरंगो को लाल रंग की रौशनी में लाया जाये। विज्ञानिको का  कहना  है , की इस प्रकार की प्रणाली चूहों में प्रत्यारोपित कर वे चूहों में डायबिटीज़ को  टच   स्क्रीन 
के माध्यम से नियंत्रित करने में सफल रहे है। 

डायबिटीज़ की दवाइयाँ 

                                                                            विज्ञानिको ने अपने प्रयोग के लिए खून की छोटी सी बूँद ली ताकि वो उसके हिसाब  से जानवर के अंदर दवा की मात्रा  डाल सके। 

                                                                             उनका लक्ष्य ऐसी सिस्टम सक्रीय करना है जिससे शुगर का  स्तर पता करने के साथ ये भी पता चलता रहे की  , दवा की कितनी मात्रा शरीर में डाली जानि चाहिए। यह विचार अभी अपने प्रारंभिक चरण में है लेकिन ये  केवल डायबिटीज़ तक ही सिमित नही है। 


                                                                              कोशिकाओं के इस्तेमाल से ऐसे विभिन्न प्रकार की दवाओ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 
                                                                        

                       
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Wednesday, 12 April 2017

जीभ : शरीर का सबसे मजबूत स्नायु

इंसान जीभ की मदद से अलग अलग भाषाए  बोल सकता है। इंसान के लिए जीभ एक बहुत ही महत्व का अंग होता है हर कोई सस्तन , पेट से सरकने वाले प्राणी को जीभ होती है। आज में आप को जीभ के बारे में बताऊंगा कुछ फैक्ट्स :

जीभ 

  •  हमारे पुरे शरीर में सिर्फ जीभ ही एक एसा स्नायु  जिसका  एक सिर हमारे शरीर से जुड़ा हुआ है और      सिरा  खुला है , मतलब की शरीर के साथ  जुड़ा नही है। 

  •  और अगर जीभ पर कोई चोट लगती है तो  बहोत जल्द ही वह ठीक हो जाती है , दूसरे अंगो के      मुकाबले। 
  • इन्सान के जीभ पर हजारो स्वादग्रंथिया होती है। जिसकी से  हम स्वाद की परख  कर  पाते है।
  • ज्यादातर प्राणिओ की जीभ स्वाद को परखने के लिए नही होतीं हे , पर  वे जीभ का इस्तेमाल खोराक को गले मेसे निचे  उतारने के लिए  करते है।  




  • इन्सानों में फिंगरप्रिंट की तरह हर व्यक्ति की जीभ की सतह की पैटर्न अलग-अलग होती है।


  • मानवो में हर दस दिनों में स्वादग्रंथियो का नाश होता है और नई  स्वादग्रंथिओं का विकास होता है। 


  • मगरमच्छ अपनी जीभ को बहार नही निकाल सकता। 






  • मेढक जीभ को  लम्बा करके कीड़ो का शिकार करता है।





                                  जिराफ अपनी जीभ को लम्बा करके अपने कान को साफ़ करता है। 






    जिराफ की जीभ पर  बाल होते है , जिसकी बजह से वो  काँटों वाले पौधों को भी खा सकता है। 





    गिरगिट की जीभ उसके अपने शरीर से भी लंबी होती है। 








    चींटीखाऊ (ENTEATER) की जबान 2 फुट लंबी होती है। और उसकी जीभ एक मिनट में 180 से 200 बार मुँह के अंदर-बहार  होती  रहती है , और वो हजारो चीटियो को खा जाता है।  
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    Sunday, 9 April 2017

    ऑक्टोपस के आठ पैर क्यों एक दूसरेमें उलझते नही है ??

    आठ पैरो वाला दरियाई जिव ऑक्टोपस चालाक और बुद्धिशाली  माना जाता है। ऑक्टोपस तो कई प्रकार के होते है लेकिन सब में एक बात समान है और वे है उनके आठ पैर , हम जब भी ऑक्टोपस को देखते है तो एक सवाल होता है की ऑक्टोपस के आठ पैर क्यों एक-दूसरे में उलझते नही है  ???

    ऑक्टोपस
                                                                                   यह समझने के लिए विज्ञानिको ने ऑक्टोपस के ऊपर कई संशोधन किये है , और उसके मुताबिक ऑक्टोपस के  अपने खुद के पैर तो ठीक है पर अगर  कोई दूसरा ऑक्टोपस पास में हे तो उसके साथ भी उसके पैर कभी उलझते नही है , !!! है कमाल की बात। 

    ऑक्टोपस

                                                                                 और यह खासियत की बजह उसके इन आठ पैरो पे लगी  ख़ास चमड़ी है , पैरो की चमड़ी किसी और मछली या शिकार की आसपास जकड़ता है , पर जब वो खुद की चमड़ी को पहचानता हे तब वो अपने  खुद के पैर को दूर कर  देता है और अपने पैरो को आपस में उलझने से रोकता है।  तो ऐसे ऑक्टोपस अपने पैरो को अपनी खुदकी चमड़ी की पहचान ने की शक्ति की बजह  से अपने आठ पैरो को आपस में उलझने से रोकता है।   
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    Thursday, 6 April 2017

    पृथ्वी के गोले का इतिहास

    अपने जियोग्राफी के क्लास में या ऑफिस में टेबल पर पृथ्वी के गोले को देखा होगा। यह गोले पर पृथ्वी के हर देशका स्थान और विविध माहिती को दर्शाया हुआ है। और उसके धरि   पर गुम सके वैसे थोड़ा टेढ़ा रखा होता है। पृथ्वी के यह गोले का बहुत ही अनोखा इतिहास है। 

     पृथ्वीका सबसे प्राचीन   गोले की फोटो ,   ईसवी 1492 में नूरेनबर्ग  के मार्टिन वीहेन नामक  खगोलशास्त्री ने  लकड़ी  और रेशे से गोले को  बनाया था

                                                                                                         ईसवी पहले पहली सदी  में ग्रीस और चीन में पथ्थर या लकड़ी का  गोला बनाकर उनपर नक्शा बनाना उसवक्त के धर्मगुरु विज्ञान , भूगोल , गणित और खगोलविद्या को जानते थे। पृथ्वीका सबसे प्राचीन  गोला   ईसवी 1492 में नूरेनबर्ग  के मार्टिन वीहेन नामक  खगोलशास्त्री ने  लकड़ी  और रेशे से गोले को  बनाया था , जो आज भी अस्तित्व में है। 

    ईसवी 1543 में जर्मनी के  कास्पर वोपेल  ने  धातु की  गोल पट्टीओ के बिच रखा हुआ धातु का पृथ्वी  का  गोला बनाया था उसकी फोटो 
          
                                                                                                         ईसवी 1543 में जर्मनी के  कास्पर वोपेल ने धातु की  गोल पट्टीओ के बिच रखा हुआ धातु का पृथ्वी  का  गोला बनाया था। और पृथ्वी के गोले के आसपास की धातु की पट्टिया ग्रहो की भृमण कक्षा दिखती है और यह गोला  एक ही  एक्सिस पर चारो और गुम सकता है। कॉपरनिकस और टोलोमी ने प्रस्तुत किये हुए ब्रम्हांड की  कल्पना के मुताबिक बना हुआ यह  गोला विश्वप्रसिद्ध  है। 

     "अर्था"
                              
                                                                                                      धरी पर गुमने वाला दुनिया का सबसे बड़ा पृथ्वी का गोला  अमरीका के मेइन शहर में रखा हुआ है। 2500 किलो वजनी इस गोले को वह  "अर्था" कहते है। 


                                                                                                        41 फुट के व्यास वाले इस गोले की सतह पे तमाम देशो के महासमुद्रो को दर्शाया गया है। एल्युमीनियम की 6000 पाइप्स को जोड़कर बनाये गए इस गोले में  792 पेनल्स को बिठाकर गोल बनाया गया है।  
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    Monday, 3 April 2017

    वर्ष 2018 में दो पर्यटको को चाँद के पास भेजेगा " स्पेस X " !!

    अमिरिकन स्पेस  एजेंसीय (agency) स्पेस X ने कहा हे की दो  आम नागरिको ने अगले साल चाँद के पास जाने के लिए भुगतान किआ है। और  इससे इंसान के अंतरिक्ष यात्रा  के अभियान को गति मिलेगी।

    स्पेस X का राकेट 

        
                                                                                                   अमरीका ने 1960 और 70 के दशक में NASA के अपोलो अभियानों के बाद अपने अंतरिक्षयात्री चाँद पर नही भेजे हे। 

    स्पेस X  लॉन्च पेड़ 

    एलन मुश्क

                                                                                                              कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलन मुश्क की और से जारी किये गए बयान में  कहा गया है , की " हम यह घोषणा करने के लिए बेहद उत्साही है ,की दो आम नागरिकों को अगले साल के अंत में चाँद के पास की यात्रा करने के लिए स्पेस X का सम्पर्क किया गया है। यह इंसानो के लिए 45 साल में पहली बार अंतरिक्ष में लौटने का अवसर पेश  करता है। वे तेज़ गति से यात्रा करेंगे और  सौरमंडल में और पहले से अधिक दुरी तक सफर करेंगे। " 
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    Friday, 31 March 2017

    25,000 वर्ष पहले भारत में पाए जाते थे शुतुरमुर्ग !

    मूल रूप से अफ्रीका में निवास करने वाले , उड़ने में अक्षम पक्षी शुतुरमुर्ग करीब  25,000 वर्ष पहले भारत में रहते थे।कोशिकीय वह आण्विक शोध के  संस्थान  CCMB ने एक अध्ययन में यह दावा किया है। शुतुरमुर्ग का मूल निवासस्थान अफ्रीका है , लेकिन कई जिव विज्ञानिको और पुरातत्वविदों को समय - समय पर भारत में , मुख्य रूप से राजस्थान और मध्यप्रदेश में , शुतुरमुर्ग के अंडो के खोल मिले है। 

                                                                       
    शुतुरमुर्ग
                                                                                                        हाल में शुतुरमुर्ग के जीवाश्म  अंडो के खोल का DNA अध्ययन करवाया गया। CCMB के के वरिष्ठ विज्ञानीक कुमारस्वामी थंगराज ने कहाँ "हमने DNA अध्ययन द्वारा शतुरमुर्ग के अंडो के खोल का सफलतापूर्वक विश्लेषण किया।




                                                                                                            और इससे प्रमाणित हुआ की भारत में पाए गए  अंडो के खोल अनुवांशिक रूप से अफ़्रीकी शुतुरमुर्ग के अंडो के खोल के समान है। और अध्ययन से पता चला है की यह  अंडो के खोल कम से कम  25,000 साल पुराने है। " 
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    Saturday, 25 March 2017

    अमरिकामें सोलार पैनल के कारण साल में 30 हजार पक्षीओ की मोत होतीहै।

    सौर्य ऊर्जा के फायदे तो कई हे , पर उससे नुकसान  भी होता है।                                                       

                                                                     
    सोलर पैनल
                 

    ऊर्जा की जरूरतों को  पूरा करने के लिए सभी देश सूर्य ऊर्जा पर जोर  दे रहे है। लेकिन एक बात जानने जैसी ये भी है की सौरी ऊर्जा  अभी तक 100 % उपयोग में ली जा सके वैसा कोई तरीका नहि विकसित किया जा  सका है , मतलब की अगर अपने सोलर पैनल डलवादी फिरभी आप निश्चिन्त रूप से बैठे नही रह सकते है , यह सोचके की अब बस लाइट का बिल बचेगा और  बिजली मुफ्त में मिलती रहेगी। क्योकि जो सोलर पैनल होते है उन्हें  थोड़े थोड़े वक्त पे बदलना पड़ता है और उसका खर्च भी अच्चा खासा  आता है और उसके साथ लगी बैटरी जिसमे सौर्य ऊर्जा से बनी बिजली का संग्रह किया जाता हे उसे भी थोड़े थोड़े वक्त पे मेंटेनन्स की जरूरत रहती है। 

    अमरीका के केलिफोर्निया राज्य में स्थित मोजावे रण या मरुस्थल में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर प्लान्ट
                                                                                             
                                                                       ये बात तो हुए सोलर पेनल्स की थी ,जिससे सौर्य ऊर्जा का रूपांतर  विधुत ऊर्जा में होता है। लेकिन इन सोलर पैनलो से उत्तपन्न होने वाली गर्मीसे 1 साल में अमरिकामें तकरीबन 30 हजार पक्षियो की मोत होती है। 

    अमरीका के केलिफोर्निया राज्य में स्थित मोजावे रण या मरुस्थल में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर प्लान्ट
                                                                                    अमरीका के केलिफोर्निया राज्य में स्थित मोजावे रण या मरुस्थल में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर प्लान्ट कार्यरत है। इस सोलर प्लान्ट को तकरीबन 2. 2 अबज डॉलर की लागत से तैयार किया गया है लेकिन अब इसे  बंध करना पड़ेगा क्योकि ऐसी प्लान्ट के नज़दीक एक पक्षी अभ्यारण्य है जिससे जब कोई पक्षी इस प्लान्ट परसे गुजरता है तो , उस प्लांट में लगे सोलर पैनलो की गर्मी की बजह से वह भून जाता है ,मतलब की उसकी मौत हो जाती है। और इस सोलर प्लान्ट की एक दिलचस्ब बात तो यह है की , इसमेसे उत्तपन्न की हुई बिजली से अमरीकाके 1. 4 लाख  घरोंमे बिजली पहोंचाइ जा सकती है। इस पुरे प्लान्ट में तकरीबन 3 लाख आईने (mirrors) लगे है।
    गर्मी की बजह से भुना गया पक्षी 

                                                                                     तो अब हो यू रहा है की जबभी कभी इन आईनो परसे कोई पक्षी गुजरता है तो उन  3 लाख आइनोसे पैदा हुए गर्मीमे भून जाता है और उसकी मोत हो जाती है। तो इस बात को लेकर पक्षी प्रेमिओ में इसका काफी विरोध चल रहा है। अब उस प्लान्ट को बन्ध करने की नोबत आ गयी है।         

                                                                  

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    Wednesday, 22 March 2017

    फेरनेस क्रीम :नाम बड़े दर्शन खोटे

     इन  दिनोंमे लड़कियो👸 के लिए तो ठीक  पुरुषों💆 को भी गोरा बनाने की  बहुत साडी फरनेस क्रीम बजारोमे उपलब्ध है। कोई लुमिनो पेप्टाइड😥  का विज्ञापन देते है। तो कोई  spf-15😥  का विज्ञापन देते है। और कई तो विज्ञापनों में  नैनो पार्टिकल तक चले जाते है। 👀  !!

                      
                                                                                                  सूरज की धुप से चमड़ीकी रक्षा करने के लिए , हमारी चमड़ी खुद " मेलेनिन😇" को बनाती है , जिससे सूरज के नुकसानकारी अल्ट्रेविओलेट किरण  हमारी चमड़ी की सतह से निचे न पहुचजाये। सूर्य के अल्ट्रावाओलेट (uv) किरण  की बजह से चमड़ी का केन्सर होता है। अगर चमड़ी  सूर्य प्रकाश में काली न हो  तो  इन्सान सामान्य प्राकृतिक रूप से गोरा ही रहेगा।  
     spf-15 , spf-30 ,spf-50 और उनका स्किन पे असर 

                                                                                                         spf-15😥  को अगर स्किन पे लगाया जाय तो , हम  2 गंटे धुप में खड़े रह सकते है। पर  अगर  spf-15😥 को चमड़ी पर न लगाया जाय तो हम धुप में सिर्फ 10 मिनट खड़े रहेंगे तब भी हमारी चमड़ी पर जलन होने लगेगी😯😯।  

                                                                                                        मतलब की  spf  सूर्य के  अल्ट्रावाओलेट (uv) किरण को हमारी चमड़ी में  दाखिल होने से रोकता है। spf का मतलब होता हे "सन प्रोटेक्शन फेक्टर। (sun protection factor) " बाजार में spf-15 , spf-30 ,spf-50  वाली स्किन क्रीम मिलती है। 


                                                                                                          spf-15😥 , 93% प्रोटेक्शन मिलता  है। यानिके 100 मेंसे 7 फोटोन चमड़ीके भीतर  जाते है। SPF-30से , 97% रक्षण मिलता है। यानिके 100 मेंसे सिर्फ  3 फोटोन चमड़ीके भीतर  जाते है। spf-50 से , 98% रक्षण मिलता है। इसलिए SPF-30 वली क्रीम का उपयोग करना ज्यादा उचित है। लेकिन SPF पानी और पसीने से धूल जाता है। इसलिए पानी में न धुले वैसी SPF प्रोडक्ट का उपयोग करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। पर CSE के रिपोर्ट के मुताबिक अगर उसमे मरक्यूरी हाजिर हो तो  वह खराब चीज है। जिससे किडनी और स्किन पे डाग या चकते न होते हे , क्योकि मरक्यूरी  न्यूरोटॉक्सिक होता है।  

                                                                                                  
                                                                           
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    Monday, 20 March 2017

    कॉपर नेनोपार्टिकल युक्त सिगरेट फ़िल्टर धूम्रपान के प्रभावो को कम कर सकता है

    जर्मनी में शोधकर्ताओ ने धूम्रपान के जहरीले कंपाउन्ड को कम करने के लिए  तांबे के नेनो पार्टिकल का उपयोग किआ है ,  एंजाइम सुपरऑक्साइड डिसम्युटेस (enzyme superoxide  dismutase) की नकल करने के लिए।



                                                           
                                                                      सुपरऑक्साइड  कण या रेडिकल (redical)  सिगरेट के धुंए में मौजूद   प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजाति(species)  है। यह  कण ऑक्सीडेटिव तनाव या स्ट्रेस , अल्ज़ाइमर , पार्किनसन्स और फेफड़ो के केंसर सहित  विभ्भिन्न रोगों में एक योगदानकारी कारक है। ऑक्सीडेटिव तनाव या स्ट्रेस को कम करने के लिए एंजाइम सुपरऑक्साइड डिसम्युटेस (enzyme superoxide  dismutase) जो की जीवित कोशिकाओं में पाए जाते है वे प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियो को हटाते है। शंशोधनकर्ताओ ने धातु केंद्रित सुपरमोलिक्युल्स का उपयोग करने से पहले इन एंजाइम के प्रभावो की कल्पना की है , लेकिन  उनकी  लागत और स्थिरता ने सस्ती और  अधिक  कुशल नकल(ताम्बे के नेनोपार्टिकल) की खोज के लिए प्रेरित किआ है। 



    ग्लाइसिन -फंक्शनलाईज़ेड  तांबे (II) हाइड्रोक्साइड नैनोपार्टिकल्स (GLYCINE-FUNCTIONALISED  COPPER (II) HYDROXIDE  NANOPARTICLES) को सिगरेट के फ़िल्टर के आगे कैसे बिठाया है यह फोटो में दिखाया गया है  और उसका  सिन्थेसिस को भी दिखाया गया है। 




                                                             अब वोल्फगैंग ट्रेमेल (wolfgang tremel) और जेन्स गुटेनबर्ग यूनिवर्सिटी  ऑफ़ मैनज (johannes gutenberg university of mainz)  में उनके समूह ने  ग्लाइसिन -फंक्शनलाईज़ेड  तांबे (II) हाइड्रोक्साइड नैनोपार्टिकल्स (GLYCINE-FUNCTIONALISED  COPPER (II) HYDROXIDE  NANOPARTICLES)  को विकसित किया है , जो कुशल और लागत प्रभावी एंजाइम सुपरऑक्साइड डिसम्युटेस (enzyme superoxide  dismutase) की नकल के रूप में कार्य करता है। उन्हों ने सिगरेट के धुए(SMOKE) में मौजूद प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियो की मात्रा को कम करने के लिए  नैनोपार्टिकल्स का उपयोग  किया था।  सिगरेट के फ़िल्टर के माध्यम से धुँए(SMOKE) को  ताम्बा नेनोपार्टिकल युक्त बनाता है जिसकी बजह से सिगरेट के धुए(SMOKE) में मौजूद प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियो की मात्रा को कम  किया जा सकता है। 
    वोल्फगैंग ट्रेमेल (wolfgang tremel)

                                                                         नैनोपार्टिकल्स ने सिगरेट की धुंए से विषैली प्रजातियो का सफाया प्राकृतिक एंजाइम सुपरऑक्साइड डिसम्युटेस (enzyme superoxide  dismutase) की तुलना में अधिक कुशलतापूर्वक किया था। वोल्फगैंग ट्रेमेल (wolfgang tremel) का मानना है , की " इन नैनोपार्टिकल्स का व्यवसायिक  उपयोग  हो सकता  है : हमने सिगरेट के फ़िल्टर पर  तांबे (II) हाइड्रोक्साइड नैनोपार्टिकल्स  का परीक्षण  किया है  और यह लगभग  15 % प्रतिक्रियाशील  ऑक्सीजन प्रजातियो को कम कर देता है। "
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    Sunday, 19 March 2017

    देश का सबसे शक्तिशाली GSLV मार्क-3 राकेट लॉन्चिंग के लिए तैयार : इसरो

    देश का सबसे शक्तिशाली GSLV मार्क - 3 राकेट लॉन्चिंग के लिए तैयार है और आने वाले दो महीनों में इसरो उसका लॉन्चिंग करेगा ऐसी खबर प्रोग्राम डायरेक्टर और सीनियर विज्ञानी  प्रो. टीजीके मूर्ति ने की थी। 


                                                                                              कोलकत्ता में प्रो. टीजीके मूर्ति ने एडवांसेज इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी की तीन दिन की  कॉनफेरेन्स में व्याख्यान देते वक्त इस बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने  कहा  था की दो महीने में  GSLV मार्क - 3 लॉन्च होगी और आने वाले दिनों में इसरो जमीन से चार सेटेलीट लॉन्च करेगा। GSLV मार्क - 3 में ज्यादा शक्तिशाली  क्रायोजेनिक इंजन का इस्तमाल हुआ है। और इसरो  आम महीनों में सार्क देशो को वेधर की जानकारी मिलती रहे इसलिए उपयोगी होने वाली शार्क सेटलाइट को  भी लॉन्च करेंगे। 

    GSLV मार्क - 3 राकेट

                                                                      2014 में नेपाल  हुए शार्क देशो की  समिट में वडाप्रधान नरेन्द्र मोदी ने इसके बारे में  खबर भी दी थी। शार्क  सेटलाइट का वजन 400 किलोग्राम होगा और वो सूर्य और जमीन पर होने वाले तापमान की  माहिती शार्क देशो के हवामान विभाग को देगा। 
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    Saturday, 18 March 2017

    हैलोसिनोजेन : ये आप को डर ने के लिए मजबूर करेगा !!

    हैलोसिनोजेन : ये आप को डर ने के लिए मजबूर करेगा !! , क्योकि अगर अपने "बैटमैन बिगिन्स" मूवी देखीहोंगी तो  आपको पता होगा की उस मूवी का विलन कैसे सबकोबहोत डरा देता है  सिर्फ कोई केमिकल(हैलोसिनोजेन)  छिड़क के और  मास्क पहन के !

                                                                          

                                                                                                                     
                                                                                                      उस मूवी में जो केमिकल वो विलेन छिड़कता हे , वह केमिकल असलियत में एक हैलोसिनोजेन हो सकता है , क्योकि   हैलोसिनोजेन  एक मनोविज्ञानिक एजेंट है जो → मतिभ्रम , अवधारणात्मक विसंगतियो  , विचारो , चेतना और  भावनाओ  में परिवर्तन का कारण बन सकता है। इस बजह से आप पे अगर कोई हैलोसिनोजेन छिड़क दे तो आप  का दिमाग भ्रमित होने लगेगा , यानि के उदाहरण के तौर पे अगर कोई रस्सी का टुकड़ा भी आपके  सामने पड़ा होगा तो वह आपको  साप नजर आने लगेगा और आप शायद ठीक से न चल पाए और सामान्य सी चीजो से भी आपको डर लगने लगेगा , कभी- कभार यह  डर इतना ज्यादा बढ़ जाता है की , डर की बजह से इन्सान की मौत तक हो  सकती है। 


                                                                                                            
    एक आम ब्रेड जो फोटोमे दाहिनी (LEFT SIDE) तरफ दिख रहा है वो सामान्य  नजरिये में दीखता है , और जो RIGHT HAND पे ब्रेड दिख रहा हे  वो जब कोई हैलोसिनोजेन  लेता है तब वैसा दीखता है। 


                                                   1946 में सर थॉमस ब्राउन ने हैलोसिनोजेन शब्द को पहली बार ढूंढा था , उन्होंने यह शब्द लेटिन के शब्द ALUCINARI  से लिया था , जिसका मतलब "मस्तिष्क में गुमना" होता है। 


                                                                                                                         हैलोसिनोजेन का प्रयोग अमेरिकी नागरिको पर किआ गया था और सबसे डरावनी बात तो यह है , की यह CIA के एक गुप्त मिशनों में से एक था। दरसल इस मिशन में ऐसा था की अमरीकी सरकार आम नागरिको और सेना के जवानों पर हैलोसिनोजेन के नशे की लत  के प्रभाव का परीक्षण  कर रही थी। 


                                                                                                  अमरीका का गुप्त विभाग"सेन्ट्रल  इन्टेलिजन्स एजेंसी" जोकि CIA के नाम से  जाना जाता है , उसके अवश्य पढ़ी जाने वाली सुविधाओ में गुप्त अभियानों पर नई अवर्गीकृत (UNCLASSIFIED) सामग्री  है जिसमे  , 1953 से 1964 तक गुप्त तौर पे चलाया गया MK-ULTRA मिशन भी है  , जिसका SF WEEKLY ने अनैतिक  तौर से CIA द्वारा   किए गए दवा परीक्षणों का पूरी तरह पर्दाफाश किआ था। CIA के परीक्षणों का भयानक मंजर शुरू हुआ था इस मिशन MK-ULTRA में , 1953 से लेकर 1964 तक CIA ने  हैलोसिनोजेन  का अवैध और अनियंत्रित  रूप से लोगो पर परीक्षण शुरू किआ था जिसमे उन्हों ने  लोगो को समुद्र तट पर , शहरो में और नजाने कई  रेस्टोरंट में अनजाने में नशा दिया था और फिर बिना कोई हस्तक्षेप किए उनका  पीछा  किआ था , और के बार तो वे हैलोसिनोजेन का इस्तेमाल  गुनहगारों की पूछताछ के लिए भी करते थे , लैकिन यह सफल नहीं हो  सका क्यों की  उनकी यह प्रक्रियाओ को असंगत ढंग से आयोजित किआ गया था , जिसकी बजह से वे उपयोगी माहिती या डेटा को प्राप्त करने में असफल रहे थे।  

                                                                                                                   अमरीका को LSD(हैलोसिनोजेन) का यह परीक्षण करना पड़ा था क्योकि  उस वक्त अमरीका का मानना था की  कम्युनिस्ट रूस या रशिया , उत्तर कोरिया और चीन दवाओं का  उपयोग अमरीकन लोगो का ब्रेन वॉश (BRAIN WASH) करने के लिए किआ था।  इस बजह से अमरीका का CIA इस संभवित और उपयोगी (नागरिको का ब्रेनवॉश करने में) तकनीक का विकास और उन्हें जवाब देने के मामले में पीछे हटना नहीं चाहता था। 

                                                                                                              

                                                                                      और इन परीक्षणों में नैतिक नियंत्रण की भी कमी थी जो की एक बहुत ही  भयानक बात थी। SF WEEKLY के ट्रॉय हूपर  ने  MK-ULTRA मिशन के कुछ आखरी जिन्दा बचे लोगो का क्या हुआ था उसके बारे में  वर्णन  किआ है : 

    " यह 50 वर्ष से अधिक हे लेकिन वेंन रिची का कहना है , की वह  आज भी याद करते है की उनको कैसे हेल्युसिनोजेनिक एसिड  का डोज़ (DOSE) दिया गया था। 

                                                                                        वे  1957 की बात थी जब वे दूसरे फेडरल ऑफिसर्स के साथ छुट्टियो की पार्टी में वे U.S के पोस्ट ऑफिस के बिल्डिंग के सातवे माले पे पीने की सोडा और  बोरबोर्न  ले  रहे थे , और वे कुछ चुटकुले और कहानियो  को कह रहे थे तभी अचानक उनका कमरा जैसे चकराने लगा या पूरा कमर जैसे उनके आसपास गुमने लगा था , और क्रिसमस के पेड़ पर लगी लाल और हरी  रौशनी बेतहाशा  चमकने लगती है। और रिची के शरीर का तापमान बढ़ गया था। उनके चारो तरफ बुलंद रंगों का  चक्राव उन्होंने  अवलोकित किआ। फिर वे कार्यालय में ऊपर की और चले गए और फिर उन्हों ने बैठकर एक गिलास पानी पिया। "




                                                                                                                                

                                                                                                                 
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    विश्व के सबसे बड़े पक्षी की पंखोंका फैलाव 24 फुट था !!

    पेलागोर्निस सान्द्रेसी नामक उस पक्षी का वजन 80 kg  भी ज्यादा था !! पेलागोर्निस सान्द्रेसी                                       ...